Thursday, August 8, 2013
Friday, July 19, 2013
कविता किस पर लिखूं..
सोचता हूं एक कविता लिख ही मारूं
पर किस पर लिखूं
मिड डे मील पर..
इसे खाने पर मौत है
संसद पर..
वहां अपराधी बैठे हैं
समंदर पर..
वह तो प्रदूषित हो गया है
राजनेताओं पर..
उनका कोई चरित्र नहीं है
राजनीति पर..
यहां जातिवाद, भ्रष्टाचार है
अफसरों पर..
वे तो बेलगाम हो चुके हैं
धर्म पर..
इसके नाम पर कट्टरता है
युवाओं पर..
वे मनमौजी हो गए हैं..
खुद पर..
जीवन क्षणभंगुर है
अब आप ही बताइए
कविता किस पर लिखूं..
भानु प्रताप सिंह
पत्रकार, आगरा
पर किस पर लिखूं
मिड डे मील पर..
इसे खाने पर मौत है
संसद पर..
वहां अपराधी बैठे हैं
समंदर पर..
वह तो प्रदूषित हो गया है
राजनेताओं पर..
उनका कोई चरित्र नहीं है
राजनीति पर..
यहां जातिवाद, भ्रष्टाचार है
अफसरों पर..
वे तो बेलगाम हो चुके हैं
धर्म पर..
इसके नाम पर कट्टरता है
युवाओं पर..
वे मनमौजी हो गए हैं..
खुद पर..
जीवन क्षणभंगुर है
अब आप ही बताइए
कविता किस पर लिखूं..
भानु प्रताप सिंह
पत्रकार, आगरा
Thursday, July 11, 2013
मेरे ही गामन में
गांव, खेती-किसानी और ग्रामीण संस्कृति पर ब्रज भाषा में छंद प्रस्तुत हैं। इन्हें सुनेंगे तो आपको अपने गांवों की महक आएगी। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है..
Wednesday, July 10, 2013
पत्रकार, फोटोग्राफर और सम्पादक पर व्यंग्य..
तू किस खेत की मूली है...
बनिगौ-बनिगौ रे विधायक मेरो बाप कि तू किस खेत की मूली है..
Tuesday, July 9, 2013
Monday, July 8, 2013
कर लो सफल जवानी को...
पावन अतीत का धरो ध्यान और छोड़ो अब नादानी को
मातृभूमि हित मरकर जीकर कर लो सफल जवानी को
बसंत पंचमी को इक बालक
चला गया था इस जग से
हरो प्राण पर धर्म न दूंगा
यही वो कहता था सबसे
बनो ‘हकीकत’ मत होने दो स्वधर्म की हानी को
मातृभूमि हित मरकर जीकर कर लो सफल जवानी को
इक राजा गिरि जंगल भटका
मातृभूमि की रक्षा को
कभी दासता मत स्वीकारो
याद करो उस शिक्षा को
बनो ‘प्रताप’ मिटा दो जग से जुल्मों की कहानी को
मातृभूमि हित मरकर जीकर कर लो सफल जवानी को
लंदन में रह रहा मगर था
सच्चा भारतवासी वो
जलियांवाला बाग का बदला
खुद ही पहुंचा फांसी को
बनो ‘ऊधम सिंह’ दुष्ट संहारो,तरस जाए जो पानी को
मातृभूमि हित मरकर जीकर कर लो सफल जवानी को..
- डॉ. भानु प्रताप सिंह, आगरा
Sunday, July 7, 2013
मेरे कविता संसार में डूब जाइए..
प्रिय मित्रो,
आज से शुरू होने जा रहा है मेरी कविताओं का प्रकाशन,
इसके लिए चाहे मुझे क्यों न करना पड़े शीर्षासन।
सोच रहा था अपनी कविताओं की पुस्तक प्रकाशित करूंगा,
सबको दिखाने के लिए थैले में भरूंगा।
कविताओं का पांडुलिपि तैयार है,
पर किताब छापना भी व्यापार है।
सो फिलहाल विचार त्याग दिया है,
ब्लॉग का सहारा लिया है।
आप सबको कविताएं सुनाकर खूब बोर करूंगा,
जो न सुनेगा, उसके कान में जमकर शोर करूंगा।
तो मेरे साथियो, तैयार हो जाइए,
मेरे कविता संसार में डूब जाइए।
आज से शुरू होने जा रहा है मेरी कविताओं का प्रकाशन,
इसके लिए चाहे मुझे क्यों न करना पड़े शीर्षासन।
सबको दिखाने के लिए थैले में भरूंगा।
कविताओं का पांडुलिपि तैयार है,
पर किताब छापना भी व्यापार है।
सो फिलहाल विचार त्याग दिया है,
ब्लॉग का सहारा लिया है।
आप सबको कविताएं सुनाकर खूब बोर करूंगा,
जो न सुनेगा, उसके कान में जमकर शोर करूंगा।
तो मेरे साथियो, तैयार हो जाइए,
मेरे कविता संसार में डूब जाइए।
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