सोचता हूं एक कविता लिख ही मारूं
पर किस पर लिखूं
मिड डे मील पर..
इसे खाने पर मौत है
संसद पर..
वहां अपराधी बैठे हैं
समंदर पर..
वह तो प्रदूषित हो गया है
राजनेताओं पर..
उनका कोई चरित्र नहीं है
राजनीति पर..
यहां जातिवाद, भ्रष्टाचार है
अफसरों पर..
वे तो बेलगाम हो चुके हैं
धर्म पर..
इसके नाम पर कट्टरता है
युवाओं पर..
वे मनमौजी हो गए हैं..
खुद पर..
जीवन क्षणभंगुर है
अब आप ही बताइए
कविता किस पर लिखूं..
भानु प्रताप सिंह
पत्रकार, आगरा
पर किस पर लिखूं
मिड डे मील पर..
इसे खाने पर मौत है
संसद पर..
वहां अपराधी बैठे हैं
समंदर पर..
वह तो प्रदूषित हो गया है
राजनेताओं पर..
उनका कोई चरित्र नहीं है
राजनीति पर..
यहां जातिवाद, भ्रष्टाचार है
अफसरों पर..
वे तो बेलगाम हो चुके हैं
धर्म पर..
इसके नाम पर कट्टरता है
युवाओं पर..
वे मनमौजी हो गए हैं..
खुद पर..
जीवन क्षणभंगुर है
अब आप ही बताइए
कविता किस पर लिखूं..
भानु प्रताप सिंह
पत्रकार, आगरा
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